हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: वर्षों बाद वरिष्ठता और पदोन्नति में बदलाव नहीं किया जा सकता
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लंबी अवधि बीत जाने के बाद प्रशासनिक या कानूनी रूप से तय हो चुकी वरिष्ठता और पदोन्नति में दोबारा बदलाव करना न तो तर्कसंगत है और न ही कानूनन उचित है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लंबे समय से लागू वरिष्ठता सूची और पदोन्नति को दोबारा बदलने से प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है और कर्मचारियों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में समयबद्धता और प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है।
हाईकोर्ट का अहम फैसला: वर्षों बाद वरिष्ठता और पदोन्नति में बदलाव नहीं होगा
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों में अत्यधिक देरी से दायर याचिकाओं को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय बाद प्रशासनिक या कानूनी रूप से तय हो चुकी वरिष्ठता और पदोन्नति में बदलाव करना न तो तर्कसंगत है और न ही कानूनन उचित।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने यह फैसला तेज पाल द्वारा वर्ष 2019 में दायर याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि उन्हें दिसंबर 1997 से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत माना जाए। उनका दावा था कि उस समय विभाग ने 10-प्वाइंट रोस्टर का सही तरीके से पालन नहीं किया था।
याचिका में 27 मई 2011 के उस सरकारी आदेश को भी चुनौती दी गई थी, जिसके तहत विभाग ने उनके विलंब से किए गए आवेदन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्षों बाद पहले से तय वरिष्ठता और पदोन्नति को बदलना प्रशासनिक स्थिरता के विपरीत है और ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
दिव्यांगता अधिनियम के तहत अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश नहीं दे सकता कोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि शुरुआत से दिव्यांग कोटे के तहत नौकरी पाने वाले कर्मचारी अपनी पसंद के स्टेशन पर ट्रांसफर के लिए सरकार को अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश देने की मांग नहीं कर सकते। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 20(4) और उसके प्रावधान केवल उन कर्मचारियों पर लागू होते हैं, जो सेवा के दौरान दिव्यांगता का शिकार होते हैं। यह कानून उन पर लागू नहीं होता, जो शुरुआत से ही दिव्यांग कोटे के तहत भर्ती हुए हैं। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता जिला निरीक्षक (उच्च पद) है, जबकि रामपुर में केवल निरीक्षक का कार्यालय है।
हाईकोर्ट का निर्देश: जहां पद नहीं, वहां तैनाती का आदेश नहीं दिया जा सकता
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को ऐसी जगह तैनात करने का आदेश नहीं दिया जा सकता, जहां उसके कैडर का पद ही मौजूद न हो। अदालत ने कहा कि दिव्यांग कोटे के तहत नियुक्त कर्मचारियों के समायोजन के लिए कानून में अतिरिक्त पद सृजित करने का कोई प्रावधान नहीं है।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता की गंभीर पारिवारिक और शारीरिक परिस्थितियों को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता ऐसे किसी स्थान पर स्थानांतरण का अनुरोध करते हैं, जहां जिला निरीक्षक का पद पहले से स्वीकृत और उपलब्ध है, तो सरकार उनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक और नियमानुसार विचार करे।
दृष्टिबाधित कर्मचारी की तबादला याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शत-प्रतिशत दृष्टिबाधित कर्मचारी की तबादला याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी को ऐसे स्थान पर तैनात नहीं किया जा सकता, जहां उसके कैडर का पद ही मौजूद न हो।
याचिकाकर्ता शिशु पाल, जो 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं, सहकारिता विभाग में जिला निरीक्षक/जिला लेखा परीक्षा अधिकारी के पद पर शिमला में कार्यरत थे। उनकी पत्नी भी 75 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं। पारिवारिक और भौगोलिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए उन्होंने अपना तबादला रामपुर करने की मांग की थी।
रामपुर में उनके कैडर का कोई रिक्त पद उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्होंने हाईकोर्ट से आग्रह किया था कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) की धारा 20(4) के तहत वहां एक अतिरिक्त पद सृजित करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया जाए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में इस उद्देश्य के लिए अतिरिक्त पद सृजित करने का प्रावधान नहीं है। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता ऐसे किसी स्थान पर स्थानांतरण का अनुरोध करते हैं, जहां उनके कैडर का पद पहले से उपलब्ध है, तो उनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक और नियमानुसार विचार किया जाए।
त्रियुंड ट्रैक पर कचरा प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए, सरकार और अफसरों को नोटिस
प्रदेश हाईकोर्ट ने धर्मशाला के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मैक्लोडगंज के ऊपर स्थित त्रियुंड ट्रैक पर ट्रैकर्स और पर्यटकों की ओर से फैलाई जा रही गंदगी और कचरे को लेकर संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा है कि वहां कचरा प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अयान भारद्वाज की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष त्रियुंड की कुछ हालिया तस्वीरें पेश की गईं। इन तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि पूरे ट्रैक और मुख्य स्थल पर कांच की बोतलें, रैपर्स और प्लास्टिक का कचरा भारी मात्रा में बिखरा पड़ा है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नोटिस जारी कर मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर जवाब तलब किया है। पहला, क्या प्रशासन के पास त्रियुंड जाने वाले ट्रैकर्स की ओर से फैलाए जाने वाले कचरे को इकट्ठा करने और उसे नीचे लाने का कोई ठोस तंत्र मौजूद है। दूसरा, त्रियुंड मार्ग और शीर्ष पर बिस्कुट, पानी की बोतलें और कोल्ड ड्रिंक्स बेचने वाले दुकानदारों के पास क्या ऐसा कोई सिस्टम है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उनके यहां से खरीदे गए सामान का कचरा वापस नीचे लाया जाए। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी, जिसमें प्रशासन को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
