Himachal: पत्नी के नाम पर दूसरी महिला का इलाज, आरोपी पति के खिलाफ एफआईआर बहाल

सेना की स्वास्थ्य योजना में धोखाधड़ी: हाईकोर्ट ने आरोपी पति के खिलाफ एफआईआर बहाल की

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेना की मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा योजना में कथित धोखाधड़ी के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे संबंधित कानूनी कार्रवाई को बहाल करने के आदेश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। अदालत के इस आदेश के बाद आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर आगे की कार्रवाई दोबारा शुरू होगी।

यह मामला सेना की मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा योजना के कथित दुरुपयोग और धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसकी जांच अब कानून के अनुसार आगे बढ़ाई जाएगी।

सेना की स्वास्थ्य योजना में धोखाधड़ी: हाईकोर्ट ने आरोपी पति के खिलाफ एफआईआर और ट्रायल बहाल किया

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेना की मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा योजना में कथित धोखाधड़ी के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्रवाई को बहाल करने के आदेश दिए हैं।

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने जिला अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत आरोपी को राहत प्रदान की गई थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब आरोपी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में आपराधिक मुकदमा दोबारा शुरू होगा।

अदालत ने दोनों पक्षों को 5 अगस्त को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होने के निर्देश भी दिए हैं।

यह मामला पालमपुर क्षेत्र का है। शिकायतकर्ता पत्नी और आरोपी की शादी वर्ष 1995 में हुई थी। वैवाहिक विवाद के चलते दोनों के बीच चंडीगढ़ की फैमिली कोर्ट में तलाक का मामला लंबित है।

अग्रिम जमानत मामले में अधिवक्ता को राहत

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता विनय शर्मा को शिमला की अदालत से बड़ी राहत मिली है। सीबीआई कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने अधिवक्ता की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया है। विनय पर छोटा शिमला थाना में 5 जून 2026 को भारतीय नागरिक संहिता की धाराओं 248, 351 और 356 (2) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह मामला पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता की शिकायत पर दर्ज हुआ है। इसमें आरोप लगाया है कि अधिवक्ता ने उनके खिलाफ झूठी, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक टिप्पणियां की हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्राथमिकी में उल्लेखित धारा 351 के तहत आपराधिक धमकी के तत्व प्रथम दृष्टया स्पष्ट नहीं हो रहे हैं। अदालत ने आदेश में कहा कि अधिवक्ता की ओर से पुलिस को दी शिकायत को झूठी जानकारी देने के मामले में पुलिस के पास स्वयं धारा 217 बीएनएस के तहत कार्रवाई करने का विकल्प था, जिसे नहीं अपनाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में आरोपी की हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

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