शिमला के शोघी औद्योगिक क्षेत्र का संकट: 45% यूनिट्स बंद, सब्सिडी के लिए हो रहा खेल
शिमला: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला जिले के एकमात्र औद्योगिक क्षेत्र शोघी में औद्योगिक विकास की तस्वीर बेहद चिंताजनक बनी हुई है। यहां करीब 45 फीसदी उद्यमियों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया है, जिसके कारण कई कारखानों में ताले लटक गए हैं और कई औद्योगिक इमारतें खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं।
मुख्य बिंदु:
- सक्रियता पर सवाल: शोघी औद्योगिक क्षेत्र में कुल 104 उद्योग पंजीकृत हैं, लेकिन ज़मीन पर इनमें से केवल 60 उद्योग ही संचालित हो रहे हैं। बाकी या तो बंद हैं या कागजों तक सीमित हैं।
- उत्पादन की जगह होलसेल का कारोबार: कई ऐसे उद्योग हैं जहां वास्तविक रूप से कोई उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग) नहीं हो रहा है, बल्कि वहां केवल होलसेल का कारोबार चलाया जा रहा है।
- सिर्फ चौकीदार के भरोसे कारखाने: कई इकाइयों में न तो मशीनें हैं और न ही किसी प्रकार का उत्पादन हो रहा है, वहां केवल देखरेख के लिए चौकीदार रखे गए हैं।
सब्सिडी का खेल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस हालात के पीछे मुख्य वजह हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पूर्व में बनाई गई औद्योगिक नीतियों के तहत मिलने वाली सब्सिडी का अनुचित लाभ उठाना है। इसके तहत उद्योग स्थापित करने के नाम पर ज़मीन की खरीद से लेकर बिजली और अन्य कई तरह की रियायतें व सस्ती सुविधाएं मिल जाती हैं, जिनका लोग गलत फायदा उठा रहे हैं।
इस स्थिति के कारण न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि सरकार के औद्योगिक उद्देश्यों को भी करारा झटका लग रहा है।
44 उद्योग पूरी तरह बंद हो चुके हैं या फिर इनकी इमारतें खाली
44 उद्योग पूरी तरह बंद हो चुके हैं या फिर सिर्फ इन उद्योगों की इमारतें खाली हैं। कुछ उद्योगपतियों ने 10-10 प्लाट खरीद लिए, जबकि उद्योग दो-तीन में चल रहे हैं। कुछ ने प्लॉट सबलेट कर रखे हैं। कुछ औद्योगिक भवनों के गेट पर घास-फूस उग आई, जिससे लगता है कि ये लंबे समय से बंद पड़े हैं। कई उद्योगपति कारखानों से मशीनें भी समेट कर ले गए हैं। बंद उद्योगों में प्रोसेस डिजाइनिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, होटल, लिफाफे, गद्दे तैयार किए जाते थे। यहां गाड़ियों के पांच-छह शोरूम, रॉयल एनफील्ड का शोरूम, कॉस्मेटिक, बर्तन, कॉटन, प्रिंटिंग प्रेस, बीयर प्लांट और एक प्लास्टिक की पानी की टंकियां तैयार करने वाला उद्योग है। यहां चार आटा मिल हैं, जहां ज्यादातर आटे की पिसाई सरकार करवाती है और उसे सरकारी राशन डिपुओं में राशनकार्ड धारकों को उपलब्ध करवाया जाता है।
तैयार माल की खपत के लिए मार्केट का अभाव
इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (आईएडीए) के सदस्य शिवम ने बताया कि उद्योगपतियों को यहां निराशा इसलिए मिली, क्योंकि यहां आसपास इतनी बड़ी कोई मार्केट नहीं है, जहां उद्योगपति अपने तैयार माल की खपत कर सकें। कच्चा माल बाहरी राज्यों से लाया जाता है, जिसका खर्च अधिक पड़ता है। इसके बाद तैयार माल को भी हिमाचल प्रदेश से बाहर जाकर ही बेचना पड़े तो फिर यह उद्योगपतियों के लिए नफे का नहीं घाटे का सौदा होता है। ऐसे में उद्योगपतियों को नुकसान हो रहा है।
जीएसटी लागू होने के बाद रियायतें खत्म
जबसे गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू हुआ, उद्योगपतियों को मिलने वाली रियायतें बंद हो गईं। टैक्स में छूट नहीं मिलती। इसके अलावा उद्योगपतियों को हिमाचल प्रदेश में भी प्रति यूनिट 5.25 रुपये बिजली का खर्च पड़ रहा है।
सड़क की हालत खस्ता, पानी का भी संकट
उद्योगपतियों का कहना है कि कई बार राज्य सरकार और प्रशासन से यहां की बुरी तरह उखड़ चुकी सड़क को दुरुस्त करने के लिए कह चुके हैं, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। समस्या यह भी है कि बड़े-बड़े ट्रॉलों में जो कच्चा माल या मशीनरी दूसरे राज्यों से लाई जाती है, उसे पहले नेशनल हाईवे पर शोघी में उतारना पड़ता है और उसके बाद छोटे वाहनों में लोड कर औद्योगिक क्षेत्र तक पहुंचाना पड़ता है। इसका कारण यह है कि औद्योगिक क्षेत्र को जाने वाली सड़क की ज्यादा चौड़ाई नहीं है और तीखे मोड़ भी हैं। पानी की सप्लाई भी बाधित होने से उद्योगपति निराशा हैं।
शोघी में प्रदेश के सैकड़ों लोगों को रोजगार दिया गया है। उद्योगपतियों के लिए बड़ी दिक्कत है कि यहां तक कच्चा माल पहुंचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन का खर्च ज्यादा रहता है। यहां ज्यादातर उद्योग चल रहे हैं। – संजय कंवर, जीएम, जिला उद्योग केंद्र
