हिमाचल हाईकोर्ट ने POCSO मामले में सुनाया अहम फैसला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने POCSO अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी शादीशुदा नाबालिग लड़की के अस्पताल में बच्चे को जन्म देने के आधार पर उसके पति या ससुराल वालों के खिलाफ अपने आप POCSO जैसा गंभीर मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी घटना को केवल उसके परिणाम के आधार पर यौन अपराध नहीं माना जा सकता, बल्कि यह देखना जरूरी है कि क्या वास्तव में किसी यौन अपराध की शिकायत या उसके समर्थन में कोई तथ्य मौजूद हैं।
अस्पताल में बच्चे को जन्म देने मात्र से POCSO का मामला नहीं बनता
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अगर कोई शादीशुदा नाबालिग लड़की बच्चे को जन्म देने के लिए अस्पताल पहुंचती है, तो इस तथ्य को ही उसके साथ हुए यौन अपराध का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। न्यायालय के अनुसार, केवल प्रसव होने की जानकारी मिलने से पति या ससुराल पक्ष के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत गंभीर आरोप लगाने का आधार अपने आप तैयार नहीं हो जाता। मामले में यह भी महत्वपूर्ण था कि पीड़िता की ओर से स्वयं किसी यौन अपराध की शिकायत नहीं की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई करते समय मामले के वास्तविक तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
पीड़िता की ओर से शिकायत नहीं होने के तथ्य पर अदालत ने दिया ध्यान
इस मामले में हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि संबंधित लड़की ने खुद किसी यौन शोषण या दुष्कर्म की शिकायत नहीं की थी। अदालत ने माना कि केवल अस्पताल में प्रसव होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके साथ कोई आपराधिक घटना हुई है। न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि POCSO कानून का इस्तेमाल बिना पर्याप्त आधार के नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराएं लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं। इसी आधार पर अदालत ने संबंधित मामले में दर्ज POCSO कार्यवाही को रद्द करने का फैसला सुनाया।
बाल विवाह और POCSO कानून के बीच अंतर को किया स्पष्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बाल विवाह और यौन अपराध से संबंधित कानूनी प्रावधानों के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया। अदालत के अनुसार, अगर विवाह के समय लड़की नाबालिग थी, तो परिस्थितियों के आधार पर बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई का सवाल उठ सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल नाबालिग होने और बच्चे को जन्म देने के कारण पति या ससुराल वालों के खिलाफ अपने आप POCSO या दुष्कर्म का मामला बन जाएगा। प्रत्येक मामले में संबंधित कानून के प्रावधानों और उपलब्ध तथ्यों को अलग-अलग देखकर ही कानूनी निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
POCSO अधिनियम की धारा 19 के उद्देश्य पर अदालत की टिप्पणी
न्यायाधीश चिराग भानु की अदालत ने POCSO अधिनियम की धारा 19 का उल्लेख करते हुए इसके उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि इस धारा का मकसद बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की जानकारी मिलने पर उनकी रिपोर्ट करना और ऐसे अपराधों को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करना है। इसका उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा देना है। हालांकि, इस प्रावधान के तहत कार्रवाई करते समय मामले की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना भी जरूरी है। अदालत ने माना कि जब पीड़िता की ओर से किसी यौन अपराध की शिकायत नहीं की गई और केवल प्रसव को आधार बनाया गया, तो ऐसे मामले में कानूनी पहलुओं की जांच आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दिया अहम संदेश
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला बाल विवाह और POCSO अधिनियम से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में केवल परिस्थितिजन्य जानकारी के आधार पर आरोप तय नहीं किए जाने चाहिए, बल्कि संबंधित कानून के आवश्यक तत्वों और उपलब्ध तथ्यों को भी देखना जरूरी है। इस मामले में पीड़िता की ओर से यौन अपराध की शिकायत नहीं किए जाने और अन्य परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत ने संबंधित POCSO कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि नाबालिग के साथ यौन संबंध या बाल विवाह को कानूनन मान्यता मिल गई है। नाबालिगों से संबंधित मामलों में लागू कानून और उनकी सुरक्षा के प्रावधान प्रभावी रहते हैं।
