हिमाचल: 30 साल तक जमीन पर कब्जा नहीं, CSIR ने खो दिया मालिकाना हक

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अधिग्रहण के बाद भी विभाग 30 वर्षों तक जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं लेता है, तो वहां रह रहे लोग प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक के हकदार हो जाते हैं। 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति के अधिकार और भूमि अधिग्रहण को लेकर सीएसआईआर की ओर से दायर याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि कानून केवल उन्हीं की सहायता करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहते हैं, न कि उनकी जो दशकों तक सोए रहते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अधिग्रहण के बाद भी विभाग 30 वर्षों तक जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं लेता है, तो वहां रह रहे लोग प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक के हकदार हो जाते हैं। यह विवाद पालमपुर में नेशनल बायोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना के लिए साल 1966 में शुरू हुई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़ा है।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कहा कि सीएसआईआर को 1966 के अवार्ड के तहत 6 सप्ताह के भीतर कब्जा लेना चाहिए था। खंडपीठ ने कहा कि चूंकि प्रतिवादी 1966 से ही उस जमीन पर बिना किसी रोकटोक के रह रहे हैं और वहां निर्माण भी कर चुके हैं, इसलिए उन्होंने प्रतिकूल कब्जे के आधार पर अपना मालिकाना हक पुख्ता कर लिया है। कोर्ट ने कलेक्टर के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि 23 वर्षों की देरी के बाद कब्जे के लिए आवेदन करना कानूनन सही नहीं है। 8 जुलाई 1966 को भूमि अधिग्रहण का अवार्ड सुनाया गया।

सीएसआईआर ने जमीन के लिए मुआवजा तो जमा कर दिया था, लेकिन जमीन का वास्तविक कब्जा लेने के लिए करीब 30 वर्षों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। करीब 23 साल बाद, वर्ष 1989 में सीएसआईआर ने पहली बार कब्जा लेने के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था। हालांकि, कलेक्टर ने प्रतिकूल कब्जे के दावे के आधार पर इस मामले को खारिज कर दिया था।

इसके बाद एकल न्यायाधीश ने वर्ष 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) के तहत इस अधिग्रहण को रद्द मान लिया था। हालांकि, बाद में खंडपीठ ने इस फैसले में संशोधन करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी मामले के फैसले के बाद केवल कब्जा न लेने के आधार पर अधिग्रहण रद्द नहीं माना जा सकता, यदि मुआवजा पहले ही दिया जा चुका हो।

इसके बावजूद अदालत ने माना कि इस मामले में प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू हो गया, जिसके चलते जमीन पर लंबे समय से रह रहे लोगों का दावा मजबूत हो गया।



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