हिमाचल प्रदेश के शिमला में जिला कल्याण विभाग ने मंगलवार को जब बुजुर्ग लोगों को युवाओं के सामने अपनी बात रखने का मंच दिया तो इनका दर्द छलक पड़ा। बुजुर्गों कहना है कि एक रसोई में भी अगर साथ बैठे हों तो बच्चे बात करने, उनकी परेशानी जानने की बजाय मोबाइल देखना पसंद करते हैं। पढ़ें पूरी खबर…
अच्छी नौकरी की तलाश में दूसरे शहरों में जा रहे युवा पैसा तो खूब कमा रहे हैं, लेकिन घर पर बुजुर्ग माता-पिता, दादा-दादी अकेले रह गए हैं। इनकी कोई सुध नहीं लेता। वहीं, जिनके लाडले घर पर हैं, वे भी अकेले हैं। बच्चे मोबाइल में खो गए हैं। दादा-दादी से कहानियां सुनना तो दूर बात तक नहीं सुनते।
जिला कल्याण विभाग ने मंगलवार को जब बुजुर्ग लोगों को युवाओं के सामने अपनी बात रखने का मंच दिया तो इनका दर्द छलक पड़ा। इंटरजेनरेशनल बॉन्डिंग कार्यक्रम में पहुंचे 60 से 80 साल तक के बुजुर्गों ने कहा कि जमाना बदल गया है। पहले युवा बुजुर्गों के पास बैठकर उनके अनुभवों और कहानियों को सुनना पसंद करते थे, उनसे सीखते थे। अब इसे समय की बर्बादी मानते हैं। एक रसोई में भी अगर साथ बैठे हों तो बच्चे बात करने, उनकी परेशानी जानने की बजाय मोबाइल देखना पसंद करते हैं। पीढ़ियों में अंतर इतना बढ़ गया है कि पोते-पोतियों में अब अपने दादा-दादी की सेवा या सम्मान की भावना कम हो गई है। गांवों की तुलना में शहरों में हालात ज्यादा बदतर हैं। पढ़ाई के बाद अच्छी नौकरी के लिए माता-पिता खुद बच्चों को दूसरे शहर या विदेश भेज रहे हैं। बच्चे दूसरे शहर में जाकर वहीं रहना पसंद कर रहे हैं। वापस तक नहीं लौट रहे। इनकी राह ताक रहे बुजुर्ग माता-पिता घर पर अकेले हैं।
युवाओं के बीच बैठकर बच्चे बन गए बुजुर्ग, बनाए चित्र, लिखीं कविताएं
आनंदपुर के साइंस भवन में सुबह 10:00 बजे जैसे ही इंटरजेनरेशनल बॉन्डिंग कार्यक्रम शुरू हुआ युवाओं के साथ बैठकर बुजुर्गों के चेहरे खिल गए। पोस्टर मेकिंग, कविता और कहानी वाचन से लेकर आपसी संवाद तक की गतिविधियां करवाई गईं। युवाओं के बीच पोस्टर और चित्र बनाने के लिए बैठे बुजुर्ग अपने हाथों से तस्वीरों में रंग भरकर काफी खुश नजर आए। कुछ बुजुर्गाें ने कविताओं के माध्यम से अपनी बातें रखीं। कुछ ने अपने अनुभव कहानी सुनाकर साझा किए। बुजुर्ग महिलाएं सबसे ज्यादा खुश दिखीं जिन्हें युवाओं ने चित्रकारी की बाारीकियां सिखाईं। कार्यक्रम में 50 से ज्यादा बुजुर्ग और इतने ही युवा पहुंचे थे।
किसने क्या कहा?
कहानियां तो दूर बात तक नहीं सुनते बच्चे
आजकल के बच्चे दादा-दादी की कहानियां तो दूर, बात तक नहीं सुनते। हर वक्त फोन में खोए रहते हैं। संस्कार भूल रहे हैं। बुजुर्गों के पैर छूना, अपनी भाषा में बात करना तक इन्हें अच्छा नहीं लगता। हमारा दौर था जब बुजुर्गों के पास बैठकर घंटों तक बच्चे कहानियां सुनते थे। –नारायण सिंह वर्मा (80 साल), बलासा गांव आनंदपुर
दोनों बेटे बाहर, घर पर हम अकेले
मेरा एक बेटा नोएडा तो दूसरा कनाडा में है। घर पर हम बुजुर्ग दंपती और एक पोता है। आज के समय में अच्छी नौकरी के लिए बच्चों को बाहर भेजना भी मजबूरी है लेकिन इससे बुजुर्ग अकेले हो रहे हैं। हमारा तो बेटे ख्याल रखते हैं लेकिन कई बुजुर्ग ऐसे हैं, जो अब अकेले हैं। –लज्जा राम सैनी (74 साल), निवासी शोघी बाजार
संयुक्त परिवार में सीखते थे बच्चे
पहले संयुक्त परिवार होते थे। दादा-दादी अपने अनुभव बच्चों को समझाते थे। अब परिवार टूट गए। माता-पिता दोनों काम में व्यस्त हैं। खाना खाते वक्त भी माता-पिता और बच्चे अपने फोन पर व्यस्त रहते हैं। इससे न तो माता-पिता अपने अनुभव बता पा रहे हैं न बच्चे अपनी परेशानी। इससे जेनरेशन गैप बढ़ रहा है। –डॉ. रवि भूषण, (63 साल), पूर्व विभागाध्यक्ष मनोविज्ञान विभाग सेंट बीड्स
बुजुर्ग की बात सुनना जरूरी
बुजुर्गाें की बात सुनना जरूरी है। उनके अनुभव से काफी कुछ सीखने को मिलता है। अब युवा काम न होने पर भी मोबाइल में इतने व्यस्त हैं कि बुजुर्गाें को समय नहीं दे पाते। जिला कल्याण विभाग ने इस बारे में जो पहल की है, उससे हालात सुधर सकते हैं। –सत्यवान पुंडीर, सचिव हिमाचल ज्ञान विज्ञान समिति
काफी कुछ सीखने को मिला
कार्यक्रम में बुजुर्गाें के साथ काफी समय बिताया। उनकी बातें सुनीं। युवाओं के साथ रहकर, खेलकर बुजुर्ग काफी खुश रहते हैं। उनसे हमें भी काफी कुछ सीखने को मिला है। बुजुर्गाें की क्या परेशानियां रहती हैं, इस बारे में भी समझ बढ़ी है। –निकिता, निवासी देहा बलसन
एक-दूसरे का दर्द समझेंगे युवा-बुजुर्ग
इंटरजेनरेशनल बॉन्डिंग कार्यक्रम का मकसद बुजुर्गों और युवाओं को एक मंच पर लाना है, जिससे वे एक-दूसरे की जरूरत और दर्द को समझ सकें। आनंदपुर से इसकी शुरुआत की गई है। अभी जिले में दो और कार्यक्रम होने हैं। बुजुर्गों को यह कार्यक्रम काफी पसंद आया है। उम्मीद है कि इससे युवा भी उनका दर्द समझेंगे। –कपिल शर्मा, जिला कल्याण अधिकारी
