Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- पारिवारिक इतिहास और सामूहिक सजा के आधार पर निवारक हिरासत अवैध

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पीआईटी-एनडीपीएस के तहत हिरासत रद्द, नागरिक अधिकारों पर जोर

हाईकोर्ट ने पीआईटी-एनडीपीएस अधिनियम के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को रद्द करते हुए कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता से समझौता करते समय कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों का पूर्ण पालन आवश्यक है।

हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला: पीआईटी-एनडीपीएस के तहत हिरासत रद्द, तुरंत रिहाई के आदेश

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पीआईटी-एनडीपीएस अधिनियम के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को अवैध ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए।

अदालत ने 19 दिसंबर 2025 के मूल हिरासत आदेश और 17 मार्च 2026 के विस्तार आदेश—दोनों को खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि केवल संदेह या गुप्त सूचना के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी को निरुद्ध करने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि उसके द्वारा भविष्य में अपराध किए जाने की ठोस और तत्काल आशंका हो।

इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने कानून व्यवस्था के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण पर भी जोर दिया है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: निवारक हिरासत का दुरुपयोग नहीं, पारिवारिक पृष्ठभूमि सजा का आधार नहीं

निवारक हिरासत को एक कठोर कानूनी प्रावधान बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि इसका उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। इसे किसी परिवार को परेशान करने या सामान्य पुलिस जांच की विफलता छिपाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक पृष्ठभूमि किसी व्यक्ति को सजा देने का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को उसके पिता, बेटों या भाई के कथित कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, भले ही उसके पिता का आपराधिक इतिहास 1972 से रहा हो।

पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता की हिरासत को उचित ठहराने के लिए पूरे परिवार के आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला दिया गया था, जिसे अदालत ने ‘सामूहिक सजा’ करार देते हुए खारिज कर दिया।

वहीं, पुलिस ने यह भी तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता नशीली दवाओं के व्यापार में शामिल है, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण के केवल आरोपों के आधार पर किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: पुराने मामलों के आधार पर निवारक हिरासत गलत, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता को आखिरी बार जुलाई 2024 में एक मामले में नामजद किया गया था, जिसमें उसे अक्टूबर 2024 में जमानत मिल गई थी। इसके बाद दिसंबर 2025 में हिरासत आदेश जारी होने तक करीब 14 महीनों में उसके खिलाफ कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ।

अदालत ने कहा कि पुराने मामलों और वर्तमान निवारक हिरासत के बीच का “जीवंत संबंध” समाप्त हो चुका है, इसलिए हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि हिरासत आदेश लागू करते समय याचिकाकर्ता को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। साथ ही, उसे अपनी बात रखने या प्रतिनिधित्व करने का उचित अवसर भी नहीं दिया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत उसका मौलिक अधिकार है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत कानून का उपयोग दंडात्मक कार्रवाई के रूप में या सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।

राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्यात्मक, वहां दायर कर सकते हैं अपील

 प्रदेश हाईकोर्ट ने जीएसटी अधिनियम के तहत दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि अब राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्यात्मक हो चुका है, इसलिए याचिकाकर्ता वहां अपनी अपील दायर कर सकते हैं। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि वे केंद्र सरकार की ओर से 17 सितंबर 2025 और राज्य कर एवं आबकारी विभाग की ओर से 24 फरवरी 2026 को जारी अधिसूचनाओं के तहत ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर कर सकते हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सीजीएसटी अधिनियम 2017 की धारा 107 के तहत अपीलीय प्राधिकरण द्वारा 5 फरवरी 2024 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के पास सीजीएसटी अधिनियम की धारा 112 के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील करने का एक प्रभावी कानूनी विकल्प उपलब्ध है। अदालत ने उल्लेख किया कि अपीलीय ट्रिब्यूनल अब कार्य करना शुरू कर चुका है, जिससे संबंधित विवादों के समाधान के लिए अब सीधे हाईकोर्ट आने की आवश्यकता नहीं है।



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