बिलासपुर का ऐतिहासिक मेला खो रहा पहचान, पूजन के लिए भी बाहर से मंगवाने पड़ रहे बैल
हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर का ऐतिहासिक राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला समय के साथ अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है। कभी यह मेला बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था, लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं।
आज स्थिति यह बन गई है कि मेले में बैलों की खरीद-बिक्री तो लगभग समाप्त हो चुकी है, बल्कि पूजन के लिए भी बैलों को बाहर से मंगवाना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बदलते समय, आधुनिक कृषि उपकरणों और परंपराओं में कमी के चलते मेले की रौनक फीकी पड़ती जा रही है। अब यह मेला अपनी पुरानी पहचान को बनाए रखने के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है।
कभी उत्तर भारत का बड़ा पशुधन मेला, अब सिमटकर रह गया सांस्कृतिक आयोजन
बिलासपुर का ऐतिहासिक राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला कभी उत्तर भारत के सबसे बड़े पशुधन मेलों में शुमार होता था। लगभग 137 वर्षों की समृद्ध विरासत को समेटे यह मेला समय के साथ अब अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है।
एक समय था जब यहां बड़े पैमाने पर पशुओं, खासकर बैलों की खरीद-फरोख्त होती थी और दूर-दराज से व्यापारी इस मेले में पहुंचते थे। लेकिन बदलते दौर में अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।
आज नलवाड़ी मेला पारंपरिक पशु व्यापार से हटकर एक सांस्कृतिक आयोजन बनकर रह गया है। स्थिति यह है कि बैलों की खरीद-बिक्री तो दूर, अब पूजन के लिए भी बैलों को बाहर से मंगवाना पड़ता है।
स्थानीय लोग इसे बदलते समय और आधुनिकता का असर मानते हैं, जिससे मेले की पुरानी रौनक धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
1889 में शुरू हुआ पशुधन मेला, बना बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान
साल 1889 में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू. गोल्डस्टीन द्वारा इस मेले की शुरुआत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाले पशुधन की उपलब्धता बढ़ाना था।
समय के साथ यह मेला बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़े बाजार के रूप में विकसित हुआ। दूर-दराज से व्यापारी यहां पहुंचते थे और यह आयोजन पशुधन व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया।
धीरे-धीरे नलवाड़ी मेला न केवल आर्थिक गतिविधियों का केंद्र रहा, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी स्थापित हो गया।
सांडू मैदान से शुरू हुआ सफर, ऊंटों पर पहुंचते थे व्यापारी, हजारों बैलों का लगता था बाजार
पुराने समय में नलवाड़ी मेला गोबिंद सागर झील में डूब चुके सांडू मैदान में आयोजित किया जाता था। 1960 के दशक में राजा के आदेशानुसार यहां यह भव्य मेला लगता था, जिसमें दूर-दराज से व्यापारी हिस्सा लेने पहुंचते थे।
उस दौर में पंजाब के रोपड़ और नवांशहर से व्यापारी ऊंटों पर सामान लादकर मेले में आते थे। वहीं, रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में बैल बिक्री के लिए यहां लाए जाते थे।
यह मेला उस समय पशुधन व्यापार का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था, जहां खरीद-फरोख्त के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-जोल भी देखने को मिलता था।
भाखड़ा बांध के बाद बदला स्थान, सांडू मैदान से लुहणू मैदान पहुंचा मेला
भाखड़ा बांध के निर्माण के बाद सांडू मैदान जलमग्न हो गया, जिसके चलते नलवाड़ी मेले को नए बिलासपुर के लुहणू मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। तब से यह मेला यहीं आयोजित किया जा रहा है।
स्थान परिवर्तन के साथ ही मेले के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। पहले यह मेला नगर पालिका द्वारा आयोजित किया जाता था, लेकिन बाद में इसे राज्य स्तरीय घोषित कर दिया गया।
इसके बाद मेले के आयोजन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन और सरकार ने संभाल ली, जिससे इसके स्वरूप और व्यवस्था में समय के साथ कई बदलाव आए।
कभी लाखों का पशुधन कारोबार, अब प्रतियोगिताओं और औपचारिकता तक सिमटा मेला
एक समय था जब नलवाड़ी मेले में लाखों रुपये के पशुधन का कारोबार होता था और बैलों की मंडी इसकी मुख्य पहचान हुआ करती थी। दूर-दराज से व्यापारी यहां पहुंचते थे और बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती थी।
लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज मेले में नाममात्र के पशु ही लाए जाते हैं, और वे भी खरीद-बिक्री के लिए नहीं बल्कि प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए आते हैं। यहां तक कि बैल पूजन के लिए भी बाहर से बैल मंगवाने पड़ते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार नलवाड़ी मेला अब अपनी मूल आत्मा से दूर होता जा रहा है। पशुधन व्यापार लगभग समाप्त हो चुका है और पारंपरिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।
हालांकि प्रशासन हर साल मेले को भव्य बनाने के प्रयास करता है, लेकिन ये प्रयास अधिकतर मनोरंजन और भीड़ जुटाने तक सीमित नजर आते हैं, जिससे मेले की पारंपरिक पहचान और भी धुंधली पड़ती जा रही है।
कभी लोक जीवन का मंच, अब बदलती परंपराओं के बीच खोती पहचान
नलवाड़ी मेला पहले लोक संस्कृति का एक जीवंत मंच हुआ करता था, जहां पारंपरिक छिंज (कुश्ती) और लोक कार्यक्रम इसकी खास पहचान थे। यह मेला केवल व्यापार का केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संजोने का माध्यम भी था।
स्वर्गीय गंभरी देवी, रोशनी देवी और संतराम चब्बा जैसे प्रसिद्ध लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती थीं। दूर-दराज के गांवों से लोग इन कलाकारों को देखने और सुनने के लिए मेले में पहुंचते थे।
यह मेला उस समय लोक जीवन, परंपराओं और सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत उदाहरण हुआ करता था, जो अब धीरे-धीरे बदलते दौर में अपनी पहचान खोता जा रहा है।
