सूत्रों के मुताबिक, यह सर्वे बिहार के सभी 38 जिलों में किया गया, जिसमें 25,000 से ज्यादा लोगों की राय ली गई। इसका मकसद था — यह पता लगाना कि जनता का रुझान किस दल के पक्ष में जा रहा है और किसकी पकड़ ढीली पड़ रही है। सर्वे के नतीजों में बताया गया है कि राज्य में एनडीए की स्थिति फिलहाल स्थिर मानी जा रही है, लेकिन कई सीटों पर कड़ी टक्कर की संभावना है।
नीतीश कुमार की लोकप्रियता अब भी कई इलाकों में बरकरार है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। हालांकि शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। वहीं, एलजेपी (LJP) की स्थिति कुछ सीटों पर बेहतर मानी जा रही है, जहां युवा वोटर उसे विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
दूसरी ओर, महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे के विवाद ने विपक्षी खेमे को कमजोर किया है। कांग्रेस और आरजेडी के बीच चल रही खींचतान से जनता में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा एनडीए को मिल सकता है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि बिहार के मतदाता अब मुद्दों के आधार पर फैसला करने के मूड में हैं। बेरोजगारी, महंगाई, और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे शीर्ष पर हैं। हालांकि, विकास कार्यों को लेकर राज्य सरकार को औसत से बेहतर रेटिंग मिली है, खासकर सड़क और बिजली व्यवस्था को लेकर।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस सर्वे के नतीजे एनडीए को रणनीति तय करने में मदद करेंगे। भाजपा अब उन सीटों पर फोकस कर रही है जहां पिछली बार जीत का अंतर बहुत कम था। वहीं, जदयू अपनी पुरानी मजबूत सीटों को सुरक्षित रखने की तैयारी में है।
एक वरिष्ठ नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि सर्वे रिपोर्ट आने के बाद शीर्ष स्तर पर कई बैठकें हुई हैं, जिनमें प्रत्याशी चयन और प्रचार रणनीति को लेकर चर्चा की गई है।
हालांकि विपक्ष का दावा है कि यह सर्वे “मनगढंत” है और एनडीए द्वारा अपनी स्थिति को बेहतर दिखाने के लिए कराया गया है। आरजेडी ने कहा है कि “जनता का मूड इस बार बदलाव का है, और असली सर्वे चुनाव के दिन ही दिखेगा।”
कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति में इस “गुपचुप सर्वे” ने हलचल मचा दी है। एक तरफ एनडीए अपनी रणनीति को धार देने में जुटा है, तो दूसरी ओर महागठबंधन इस रिपोर्ट को लेकर सवाल उठा रहा है। अब देखना यह है कि सर्वे के आंकड़े कितने सही साबित होते हैं और चुनावी मैदान में किसके हाथ में वाकई में “अपर हैंड” रहता है।
