उत्तराखंड की पवित्र भूमि पर आज सुबह आस्था और भावनाओं का संगम देखने को मिला, जब हिमालय की गोद में स्थित भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम के कपाट विधिवत रूप से बंद कर दिए गए। जैसे ही मंदिर के मुख्य द्वार बंद हुए, पूरी घाटी “हर-हर महादेव” और “जय भोलेनाथ” के जयकारों से गूंज उठी। भक्तों की आंखों में आंसू थे, होंठों पर श्रद्धा थी, और हृदय में इस आशा की लहर कि अगले वर्ष जब कपाट खुलेंगे, तो वे फिर से अपने आराध्य के दर्शन कर पाएंगे।
आज प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में पूजा-अर्चना और विशेष रीतियों के साथ कपाट बंद करने की प्रक्रिया आरंभ की गई। मंदिर के मुख्य पुजारी और रावल ने परंपरागत विधि से पूजा संपन्न की। सबसे पहले भगवान केदारनाथ का श्रृंगार उतारा गया, गर्भगृह में दीपक और धूप जलाए गए, और फिर भक्तों की उपस्थिति में “जय भोले” के जयघोष के बीच कपाट बंद किए गए। शीतकाल के दौरान बाबा केदार की पूजा उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में की जाएगी, जो भगवान केदार का शीतकालीन निवास स्थल है।
जैसे ही कपाट बंद हुए, मंदिर के चारों ओर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने दोनों हाथ जोड़कर अपने ईष्टदेव को नमन किया। ठंडी हवाओं और बर्फीली फुहारों के बीच भक्तों की आवाजें गूंजती रहीं — “हर-हर महादेव”, “बोल बम भोले” और “जय शंकर” के नारे पूरी घाटी में प्रतिध्वनित होते रहे। कई श्रद्धालु भावुक होकर रो पड़े, क्योंकि उनके लिए यह क्षण केवल एक धार्मिक घटना नहीं बल्कि आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक था।
धाम बंद होने से पहले सुबह से ही मंदिर परिसर में विशेष पूजा अनुष्ठान चल रहे थे। रावल जी और तीर्थ पुरोहितों ने विधि-विधान के साथ बाबा केदार की डोली को सजाया, जिसे कपाट बंद होने के बाद उखीमठ के लिए रवाना किया गया। यह डोली यात्रा कई स्थानों पर रुकेगी, जहां श्रद्धालु फूलों से इसका स्वागत करेंगे। डोली की यह यात्रा अगले कुछ दिनों में उखीमठ पहुंचेगी, जहां अगले छह महीनों तक भगवान केदार की पूजा-अर्चना होगी।
इस अवसर पर उत्तराखंड सरकार और बदरी-केदार मंदिर समिति ने विशेष प्रबंध किए थे। पुलिस, प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमें पूरी रात और सुबह से ही सुरक्षा व्यवस्था में जुटी रहीं। सुबह-सुबह तापमान गिरने और हल्की बर्फबारी के बावजूद हजारों भक्तों ने धाम पहुंचकर बाबा केदार के दर्शन किए।
मंदिर के पुजारियों ने बताया कि कपाट बंद होने से पहले बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा केदार की प्रतिमा के दर्शन करने पहुंचे। गर्भगृह में आरती के दौरान वातावरण इतना भावुक हो गया कि हर कोई “महादेव” के नाम में खो गया। जब मंदिर के मुख्य द्वारों को बंद किया गया, तब भक्तों ने फूलों की वर्षा करते हुए भगवान से अगले वर्ष पुनः बुलाने की प्रार्थना की।
गौरतलब है कि इस वर्ष केदारनाथ यात्रा सीजन बेहद सफल रहा। लाखों श्रद्धालुओं ने बाबा केदार के दर्शन किए। रिकॉर्ड संख्या में तीर्थयात्री देश-विदेश से पहुंचे। बदरी-केदार मंदिर समिति के मुताबिक, इस बार पिछले वर्षों की तुलना में यात्रियों की संख्या में करीब 25% की वृद्धि हुई। प्रशासन ने कहा कि यात्रा के दौरान सुरक्षा और सुविधाओं के बेहतर इंतजाम किए गए, जिससे भक्तों को किसी भी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।
धाम के बंद होते ही अब यह क्षेत्र धीरे-धीरे शीतकालीन निद्रा में चला जाएगा। नवंबर से लेकर अप्रैल के अंत तक केदारनाथ धाम बर्फ की चादर में ढक जाता है, और इस अवधि में यहां आमजन का प्रवेश वर्जित रहता है। भारी बर्फबारी और शून्य से नीचे तापमान के कारण यहां जीवन रुक-सा जाता है। इसीलिए भगवान केदार की पूजा उखीमठ में की जाती है, जहां भक्त सालभर दर्शन कर सकते हैं।
कपाट बंद होने के बाद अब पूरे उत्तराखंड में सर्दियों की दस्तक और तेज हो गई है। चारधामों में यह समय विशेष महत्व रखता है क्योंकि यहीं से पर्वत श्रृंखलाओं पर देवताओं की शीतकालीन यात्रा का आरंभ होता है। आने वाले दिनों में बदरीनाथ धाम के कपाट भी विधिवत बंद कर दिए जाएंगे।
आज का दिन हर शिवभक्त के लिए भावनाओं से भरा रहा। घाटी में फैली ठंडी हवा, हिमालय की ऊंची चोटियों पर चमकती सफेद बर्फ, और मंदिर परिसर में गूंजते “हर हर महादेव” के नारे — इन सबने माहौल को दिव्यता से भर दिया। जैसे ही मंदिर के कपाट बंद हुए, भक्तों ने हाथ जोड़कर कहा — “जय भोलेनाथ, अगले वर्ष फिर बुलाना।”
