सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जा उत्तराधिकार योग्य: हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला
शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण से प्राप्त प्रतिकूल कब्जा भी उत्तराधिकार के योग्य हो सकता है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर की एकल पीठ ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले में प्रतिवादी सुकन देवी को उनके दिवंगत पति द्वारा की गई सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के आधार पर कब्जे का उत्तराधिकारी माना गया।
अदालत ने कहा कि यदि कब्जा लंबे समय तक निर्विघ्न और स्पष्ट रूप से बना रहा हो, तो वह प्रतिकूल कब्जे के रूप में मान्य हो सकता है और उत्तराधिकार में स्थानांतरित किया जा सकता है।
इस फैसले के बाद सुकन देवी को उक्त भूमि पर अधिकार बनाए रखने और राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाने का वैधानिक अधिकार मिल गया है।
यह निर्णय प्रतिकूल कब्जा और उत्तराधिकार कानून की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। नुकसान हुआ। राजस्व विभाग की टीम ने नुकसान का आकलन शुरू कर दिया है। मामले में आगे की कार्रवाई जारी है।
प्रतिकूल कब्जा उत्तराधिकार योग्य: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) उत्तराधिकार में स्थानांतरित हो सकता है। अदालत ने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के “रविंद्र कौर ग्रेवाल बनाम मनजीत कौर एवं अन्य” केस का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिकूल कब्जा विरासत में प्राप्त किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर की एकल पीठ ने कहा कि 1963 से ही राज्य के राजस्व अधिकारियों को प्रतिवादी सुकन देवी के दिवंगत पति गुरदास द्वारा किए गए अतिक्रमण की जानकारी थी। यह कब्जा लगातार 30 वर्षों तक निर्विघ्न बना रहा, जिससे यह कानूनन वैध प्रतिकूल कब्जा बन गया। न्यायालय ने माना कि यह कब्जा अब कानूनी उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित किया जा सकता है।
इसके साथ ही अदालत ने राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टियों के प्रभाव और अधिकार विवादों के संदर्भ में हिमाचल प्रदेश राजस्व अधिनियम की धारा 46 का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे प्रभावित व्यक्ति घोषणात्मक डिग्री (Declaratory Decree) के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर सकता है।
अदालत के इस फैसले के बाद सुकन देवी को न केवल भूमि पर कब्जा बनाए रखने, बल्कि राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज करवाने का वैधानिक अधिकार भी मिल गया है।
सरकारी जमीन पर 30 साल के कब्जे के बाद मिला हक, हाईकोर्ट ने सुकन देवी के पक्ष में सुनाया फैसला
शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार की दूसरी अपील को खारिज करते हुए प्रतिवादी सुकन देवी को उनके दिवंगत पति गुरदास द्वारा किए गए लंबे समय के कब्जे के आधार पर स्वामित्व अधिकार का पात्र माना है।
राज्य सरकार ने इस मामले में बिलासपुर के जिला न्यायाधीश द्वारा 12 अक्टूबर 2015 को पारित उस निर्णय और डिक्री को चुनौती दी थी, जिसमें सिविल जज (जूनियर डिवीजन) द्वारा 30 अप्रैल 2015 को दिए गए फैसले को बरकरार रखा गया था।
1963 से कब्जा, 1993 में स्वामित्व का दावा
प्रतिवादी सुकन देवी ने अदालत में तर्क दिया कि उनके पति गुरदास ने 13 जनवरी 1963 से हिमाचल प्रदेश सरकार की भूमि पर कब्जा किया और वहां एक आवासीय मकान का निर्माण किया। यह कब्जा लगातार 30 वर्षों तक शांतिपूर्वक और बिना किसी कानूनी आपत्ति के बना रहा, जिसके बाद 13 जनवरी 1993 को गुरदास को वैधानिक प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक मिल गया।
गुरदास की 18 जून 2008 को मृत्यु के बाद, सुकन देवी ने उसी संपत्ति पर कब्जा बनाए रखा और उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम बतौर मालिक दर्ज करवाने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों और कानूनी बिंदुओं का संज्ञान लेते हुए निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराया और राज्य की अपील को खारिज कर दिया। यह निर्णय प्रतिकूल कब्जे के उत्तराधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है।
