Himachal: सीबीएसई सब-कैडर भर्ती में टीजीटी शिक्षकों को हाईकोर्ट से अंतरिम राहत नहीं

सीबीएसई सब-कैडर भर्ती: टीजीटी शिक्षकों को हाईकोर्ट से राहत नहीं

हाईकोर्ट ने टीजीटी शिक्षकों को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है। शिक्षकों ने खुद को डीम्ड (मानित) पीजीटी मानते हुए सीबीएसई सब-कैडर की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने फिलहाल स्वीकार नहीं किया।

सीबीएसई सब-कैडर भर्ती: टीजीटी शिक्षकों को हाईकोर्ट से अंतरिम राहत नहीं

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने टीजीटी शिक्षकों को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने खुद को डीम्ड (मानित) पीजीटी मानते हुए सीबीएसई सब-कैडर की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी।

न्यायाधीश अजय गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत के लिए तीन शर्तें—प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूर्णीय क्षति—याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नहीं हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी राहत देना न्यायिक औचित्य के खिलाफ होगा, क्योंकि इससे ऐसे लोगों को भर्ती में शामिल किया जा सकता है, जिनका उस पद के लिए फिलहाल कानूनी अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने गुरबख्श सिंह एवं अन्य के मामले में अंतरिम राहत की मांग को खारिज कर दिया है। हालांकि, मुख्य याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने राज्य सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

टीजीटी शिक्षकों की मांग: पदोन्नति लागू कर भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने की अपील

वर्तमान में टीजीटी के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि 23 सितंबर 2025 की संशोधित अंतिम वरिष्ठता सूची को लागू किया जाए। साथ ही, उन्हें पीजीटी पद पर पदोन्नत माना जाए, ताकि वे सीबीएसई संबद्ध स्कूलों के लिए बनाए गए नए सब-कैडर की भर्ती परीक्षा और काउंसलिंग में भाग ले सकें।

इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने यह भी अनुरोध किया था कि सीबीएसई सब-कैडर के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 5 मार्च 2026 तक या तब तक बढ़ाई जाए, जब तक उनकी पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

हाईकोर्ट में सरकार का पक्ष: टीजीटी को पीजीटी मानकर भर्ती में शामिल करना गलत

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के महाधिवक्ता अनूप रतन ने दलील दी कि यह मामला पहले से ही खंडपीठ के समक्ष लंबित है। उन्होंने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता अभी भी टीजीटी के पद पर कार्यरत हैं, इसलिए उन्हें पीजीटी मानकर भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति देना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।

अदालत ने सरकार के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को पीजीटी मानकर भर्ती में शामिल होने की अनुमति दी जाती है, तो यह उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा जो वर्तमान में वास्तव में पीजीटी पद पर कार्यरत हैं और पहले से ही भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

रिब्बा-कांडा लिंक रोड का काम लटका, हाईकोर्ट ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय को बनाया पक्षकार

 प्रदेश हाईकोर्ट ने किन्नौर जिले की रिब्बा-कांडा लिंक रोड परियोजना के निर्माण में हो रही देरी और फंड रुकने के मामले में कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को नया प्रतिवादी बनाया है और नोटिस जारी किया है। अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बजट का लगभग आधा हिस्सा खर्च हो चुका है, लेकिन सड़क अधूरी रहने से यह न केवल विकास कार्य में बाधा है, बल्कि जनता के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है।

सड़क निर्माण में फंड और समय सीमा पर हाईकोर्ट ने निर्देश जारी किए, अगली सुनवाई 5 मई को

हाईकोर्ट ने डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया को निर्देश दिए हैं कि वे वित्त मंत्रालय से फंड जारी करने या परियोजना की समय सीमा बढ़ाने के संबंध में जानकारी प्राप्त करें। अदालत ने सभी प्रतिवादियों को आपस में मिलकर समाधान निकालने की छूट भी दी, ताकि अब तक खर्च किया गया पैसा व्यर्थ न जाए।

मामले में बताया गया कि 11.725 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण साल 2017 में मंजूर हुआ था, जिसके लिए 757.70 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया। अब तक 377.14 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं। हालांकि लगभग 11 किलोमीटर की कटिंग का काम पूरा हो चुका है, लेकिन सड़क अभी भी आम जनता के लिए उपयोग के लिए तैयार नहीं है।

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को निर्धारित की है।

हाईकोर्ट में लोक निर्माण विभाग और नाबार्ड ने सड़क परियोजना की देरी पर बताया कारण

लोक निर्माण विभाग ने सड़क परियोजना में देरी के लिए पहले कोविड-19 महामारी और उसके बाद अचानक आई बाढ़ व भारी बारिश का हवाला दिया।

सुनवाई के दौरान नाबार्ड के उप महाप्रबंधक कुशल दीप व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस परियोजना को पूरा करने की मूल समय सीमा 31 मार्च 2020 थी, जिसे राज्य सरकार के अनुरोध पर सितंबर 2023 तक बढ़ा दिया गया था। हालांकि, अब ट्रेंच बंद होने के कारण नाबार्ड सीधे फंड जारी नहीं कर सकता।

नाबार्ड ने अदालत को बताया कि इस स्थिति में दो ही विकल्प हैं—या तो केंद्रीय वित्त मंत्रालय विशेष अनुमति दे या राज्य सरकार अधूरी परियोजना को नई प्राथमिकता वाली परियोजना के रूप में नाबार्ड को पुनः भेजे। अदालत ने इसके बाद केंद्रीय वित्त मंत्रालय को इस मामले में पक्षकार बना दिया।




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