निगम को बचाने के लिए कड़े फैसलों की जरूरत: हाईकोर्ट
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने अपने अहम टिप्पणी में कहा कि निगम को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए राज्य सरकार को मुफ्त सुविधाओं पर नियंत्रण लगाना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थिति को संभालने के लिए सरकार को कड़े और प्रभावी निर्णय लेने आवश्यक हैं।
एचआरटीसी की वित्तीय स्थिति पर हाईकोर्ट सख्त, मुफ्त सुविधाओं पर लगाम लगाने के संकेत
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की खराब वित्तीय स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि निगम को बचाने के लिए राज्य सरकार को मुफ्त सुविधाओं पर नियंत्रण लगाना होगा और कड़े फैसले लेने होंगे।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि उन 28 श्रेणियों की विस्तृत सूची प्रस्तुत की जाए, जिन्हें वर्तमान में मुफ्त यात्रा सुविधा दी जा रही है, ताकि इन सुविधाओं में कटौती की संभावनाओं पर विचार किया जा सके।
एचआरटीसी पर हाईकोर्ट की सख्ती, निजी ऑपरेटरों से तुलना के दिए निर्देश
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की कार्यप्रणाली और वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि यह जांच की जाए कि निजी ऑपरेटर कम लागत में बेहतर सुविधाएं कैसे प्रदान कर रहे हैं और क्या उनकी उचित जांच-पड़ताल (चेकिंग) की जा रही है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबी दूरी के रूटों को लाभदायक बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही सरकार से सवाल किया कि जब निजी ऑपरेटर मुनाफे में हैं, तो निगम घाटे में क्यों चल रहा है।
अदालत ने नोट किया कि निगम वर्तमान में 28 श्रेणियों के नागरिकों को मुफ्त या रियायती यात्रा सुविधा दे रहा है। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को निर्धारित की गई है, जिसमें अन्य 27 संबंधित निष्पादन याचिकाओं को भी एक साथ सुना जाएगा।
एचआरटीसी गहरे आर्थिक संकट में, आय से दोगुना खर्च: हलफनामे में खुलासा
हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की वित्तीय स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। मुख्य सचिव की ओर से 12 दिसंबर को दायर हलफनामे में खुलासा किया गया है कि निगम इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
अदालत में पेश आंकड़ों के अनुसार, एचआरटीसी की मासिक आय लगभग 70 करोड़ रुपये है, जबकि खर्च करीब 145 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो आय से दोगुना है। निगम पर कुल 1396 करोड़ रुपये की देनदारी है, जिसमें से 1130.24 करोड़ रुपये कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बकाया के रूप में शामिल हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि करीब 1,750 बस सेवाएं ऐसी हैं जो डीजल और रखरखाव का खर्च तक नहीं निकाल पा रही हैं। निगम के पास अब बहुत कम लाभकारी रूट बचे हैं, जबकि निजी ऑपरेटर केवल मुनाफे वाले रूटों पर बसें संचालित कर रहे हैं।
सरकार की ओर से हर महीने औसतन 60 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है, लेकिन यह सहायता भी निगम के बढ़ते घाटे को पूरा करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रही है।
